Sushila Karki, (file Photo)
Sushila Karki: नेपाल में भड़के Gen Z आंदोलन ने अब अपना अगला रास्ता तय कर लिया है. करीब चार घंटे चली वर्चुअल बैठक में आंदोलनकारियों ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम नेता स्वीकार कर लिया जेन-जेड के सदस्यों ने साफ कहा कि किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े किसी भी युवा को नेतृत्व का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा. कार्की को उनकी निष्पक्ष छवि और राजनीतिक दलों से दूरी की वजह से चुना गया. समूह ने कहा कि मौजूदा हालात में उनसे बेहतर कोई विकल्प नहीं है.
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बैठक में काठमांडू के मेयर बालेंदर शाह और युवा नेता सागर ढकाल के नाम भी सामने आए, लेकिन कार्की पर ही सहमति बनी. आंदोलनकारी अब औपचारिक घोषणा करेंगे. इससे पहले, सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल ने जेन-जेड को कुछ दलों और नेताओं से बात करने का सुझाव दिया था, जिसे समूह ने खारिज कर दिया.
इस बीच, बुधवार को कर्फ्यू के साये में काठमांडू की सड़कें वीरान रहीं. सेना ने सुबह से शाम तक प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए और रात में कर्फ्यू बढ़ा दिया। संसद, राष्ट्रपति भवन और सुप्रीम कोर्ट पर हमलों के बाद सड़कों पर केवल सुरक्षा बल ही नजर आए. अब तक 27 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. सेना का कहना है कि कुछ असामाजिक तत्व हालात का लाभ उठाकर सार्वजनिक संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचा रहे हैं.
सुशीला कार्की का जन्म 7 जून 1952 को विराटनगर में हुआ था. सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी कार्की ने क़ानून की पढ़ाई के बाद 1979 में विराटनगर में वकालत शुरू की. 1985 में, उन्होंने महेंद्र मल्टीपल कैंपस, धरान में सहायक शिक्षिका के रूप में भी अपनी सेवा दी. साल 2007 में वे वरिष्ठ अधिवक्ता बनीं.
22 जनवरी 2009 को, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का तदर्थ न्यायाधीश और 2010 में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया. 2016 में, वे नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं. यह अपने आप में एक ऐतिहासिक पल था. उन्होंने 11 जुलाई 2016 से 7 जून 2017 तक सुप्रीम कोर्ट का कार्यभार भी संभाला.
कार्की के कार्यकाल में बड़े फ़ैसले लिए गए. हालाँकि 2017 में माओवादी केंद्र और नेपाली कांग्रेस ने उनके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाया. इस कदम का पूरे देश में जमकरविरोध हुआ. सुप्रीम कोर्ट ने संसद को भी ठप करने का आदेश दिया और अंततः प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. इस घटना ने कार्की को दबाव के बावजूद अडिग रहने वाला व्यक्ति बना दिया.
कार्की का विवाह दुर्गा प्रसाद सुवेदी से हुआ है, जिनसे उनकी मुलाकात बनारस में पढ़ाई के दौरान हुई थी. सुवेदी उस समय नेपाली कांग्रेस के एक प्रसिद्ध युवा नेता थे और पंचायती राज के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में सक्रिय थे. उनका नाम एक विमान अपहरण मामले में भी आया था.
न्यायालय से सेवानिवृत्त होने के बाद, कार्की ने किताबें भी लिखीं. उनकी आत्मकथा ‘न्याय’ 2018 में प्रकाशित हुई और उनका उपन्यास ‘कारा’ 2019 में प्रकाशित हुआ, जो विराटनगर जेल के अनुभवों पर आधारित है.
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